कोरोना काल में चिंतकों की चिंता

यूँ तो भारत सदैव ही महान चिंतकों और चिंतितों का देश रहा है, लेकिन कोरोना काल में देश में चिंतकों का जैसे सैलाब सा आ गया है। प्यारे जी इसी सैलाब में उफनकर आये हुए चिंतक हैं और अक्सर चिंतित रहते हैं। लेकिन भारत जैसे खिचड़ी देश में चिंतक होना भी कहाँ आसान है। हमारे यहाँ समस्याओं की आवृत्ति इतनी ज़्यादा है कि किसी एक विषय पर टिककर चिंतन कर पाना किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं रही। परिस्थितिवश चिंतक को गुलाटियाँ मारते हुए जल्दी-जल्दी एक विषय से दूसरे विषय पर अपना चिंतन विस्थापित करना पड़ता है, और प्यारे जी अपनी छहरहरि काया के साथ ये काम बखुबी कर पा रहे हैं।

कोरोना काल की शुरुआत से ही वे हर छोटी-बड़ी घटना पर पैनी नज़र जमाए हुए हैं। जब जानकारी से लबालब भर जाते हैं, तो फेसबुक पर अपने अबोध मित्रों में वितरित कर देते हैं। शासन तथा प्रशासन के दिमाग सुन्न पड़े हुए हैं, लेकिन प्यारे जी की कोरोना रणनीति एकदम स्पष्ट और असरदार है। हालाँकि चिंतित तो वे शुरू से ही थे लेकिन प्रवासी मज़दूरों के संघर्ष की ख़बरों ने उनके चिंतन को एक क्रांतिकारी मोड़ दे दिया। दर्द के दरिया में तैरते हुए उन्होंने एक के बाद एक कई फेसबुक ग्रुप्स छान डाले, और कुछ बेहद नाभिस्पर्शी पोस्ट ढूंढ निकाली। नाभिस्पर्शी इसलिए कि नाभि शरीर में मौजूद है, यह एक प्रामाणिक तथ्य है। प्यारे जी स्वयं हर घंटे अल्पाहार के बाद पेट पर हाथ फेरकर इसकी पुष्टि करते हैं। वे मर्मस्पर्शी के चक्कर में कभी नहीं पड़ते। मर्म का क्या भरोसा, ज़िंदा है भी या नहीं किसे पता।

ख़ैर, मज़दूरों के ग़म में प्यारे जी एक के बाद एक नाभिस्पर्शी पोस्ट अपनी टाइमलाइन पर चेंप रहे थे और द्रवित मन से समोसे की ख़ुश्बू ले रहे थे। सचमुच हृदय विदारक दृश्य था। एक ओर भूखे मज़दूरों के प्रति संवेदनाएं फेसबुक पर बह रही थीं, दूसरी ओर हाथ में थाल लिए श्रीमतीजी समोसे ठूंसने का आग्रह कर रही थीं। अभी तो पोस्ट पर आँसू वाले इमोजी भी आना शुरू नहीं हुए थे और ये धर्म संकट आन पड़ा। मग़र फेसबुकियत नाम की भी कोई चीज़ होती है। प्यारे जी ने समोसे भरी थाल सामने से ऐसे सरका दी, जैसे प्रभु श्री राम ने हँसते हँसते राजपाट छोड़ दिया था। आख़िर दस मिनट के लम्बे इंतज़ार के बाद आंसुओं से तरबतर पहला इमोजी आया। उसके बाद तो संवेदनाओं की झड़ी लग गयी। भावनाओं में बहते हुए प्यारे जी अभी चार समोसे भी न दबा पाए थे कि कम्बख़्त एक ट्रोलर आ धमका। टप्प से कमेंट चेंप गया कि “आपने अब तक किसी मज़दूर के लिए क्या किया?” प्यारे जी भिन्ना गये। ट्रोलर की माताजी को प्रणाम करते हुए उसे खड़ी बोली में समझाया “बरखुरदार, हम चिंतक हैं, हमारा काम है चिंतन करना और अपने क्रांतिकारी आलेखों से समस्याओं की ओर दूसरों का ध्यान आकर्षित करवाना, न कि तलवार लेकर ख़ुद कूद पड़ना।” ट्रोलर को ऑनलाइन परास्त करने के बाद, एक अजीब सी चमक थी प्यारे जी के चहरे पर। पहली बार ट्रोल हुए थे, सेलिब्रिटी टाइप फीलिंग आ रही थी।

इधर समोसे गटकते हुए श्रीमतीजी सोच रही थीं “जाने कौन चुड़ैल से नैन लड़ गए जो इतना दमक रहे हैं।” मुखमण्डल पर विजय श्री का तेज़ लिए प्यारे जी ने बालकनी से बाहर का नज़ारा लिया। बायपास से मज़दूरों का जत्था गुज़र रहा था। भीतर का चिंतक फिर कुलबुलाने लगा। अलमारी से रेड लेबल ख़ुद ब ख़ुद बाहर आ गयी और समोसों के साथ प्यारे जी के चिंतन में शरीक हो गयी। घूंट-घूंट कर प्यारे जी बोतल भर ग़म गटक गए।

लेखक :- सारिका गुप्ता

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