महिला दिवस पर विशेष

हर बार महिला दिवस पर हम महिलाओं के सम्मान की, उनकी तरक्की की और उनके द्वारा हासिल किए गए पुरुस्कारों के बारे में बातें करते हैं, महिलाओं ने समाज से, समाज की कुरीतियों से और बाहर की दुनिया से जंग किस बहादुरी से लड़ी सब जानते हैं, क्योंकि ये बातें हमें बताई जाती हैं, पर आज मैं कुछ अलग कहना चाहती हूं अपने निजी अनुभव से, जो मैंने इस दुनिया से और अपने भीतर की दुनिया से सीखा है, हम महिलाएं बहुत सारे रिश्ते निभाते हैं, सबके बारे में सोचते हैं लोक लाज और शर्म इसी की आड़ में अपने विचारों और सपनों को कहीं भूल जाते हैं दुनिया के चलन के हिसाब से वक्त की मांग के हिसाब से खुद को बदलते हैं पर सच बताना जो बदलाव हम स्वीकारते हैं उसमें कितने प्रतिशत हमारी सहमति होती है यहां मैं अंदर वाली सहमति की बात कर रही हूं, बाहर वाली नहीं।
आपको पता है न जाने कितनी बार अपना मन मारकर दूसरों की खुशी के लिए हम तत्पर खड़े हो जाते हैं दुनिया से लड़ने निकलते हैं पर कभी-कभी खुद से ही हार जाते हैं।
खुद को बहुत मजबूत और माॅर्डन समझने वाले हम अपने विचारों को रखने से भी कतराते हैं, जो परिवार, जो दुनिया हम से बनी है उससे तो सम्मान की उम्मीद रखते हैं पर कभी-कभी खुद ही अपना सम्मान करना भूल जाते हैं।
खुलकर हंसना, खुलकर रोना अपनी भावनाओं को दूसरों के क्या खुद के सामने रखने में भी अपनी कमजोरी, अपनी हार मानते हैं।
सारी जिंदगी लड़की हैं, औरत हैं, स्त्री हैं अपनी पहचान को एक कमी की तरह बताते हैं आखिर क्यों?
इस महिला दिवस पर मैं भी ये कोशिश कर रही हूं कि खुद की जंग खुद से ही लड़कर, खुद के लिए जीत कर दिखाऊं, ताकि किसी और की निगाह में सम्मान की हकदार बनने से पहले मैं खुद अपना सम्मान अपनी निगाह में बरकरार रख पाऊं।
दिखा दूं मेरे अंदर बैठी तमाम नकारात्मक ऊर्जा को की बस बहुत हुआ मैंने खुद को हासिल कर लिया है अपना वजूद जानती हूं तो किसी भी नकारात्मक सोच को मेरा आंकलन करने की जरूरत नहीं मैं अंदर से मजबूत हूं, एक यौद्धा की तरह।

लेखिका/कवयित्री – अंकिता जैन अवनी, अशोकनगर, म.प्र.

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