“घर खो गया …..”

न जाने ये कब और केसे हो गया
हम मकानों में चले आये और घर खो गया ….
वो बात कहाँ
इन आलीशान आशियानों में
जो बात थी
गांव के पुश्तेनी मकानों में
ये जगमगाता फर्श
ये रोशन दीवारें
खिड़की से नज़र आते
शहर के हंसीं नज़ारे
हें महंगे फानूस
बड़ी सी कुर्सी
और भारी सी मेज भी
रंग-बिरंगा कालीन भी
और मोटे गद्दे की सेज भी
पर वो बात कहां
आलीशान दीवारों में
जो थी उन मोटी ,कच्ची
और जगह जगह से उधड़ी दीवारों में
जब उधड़ी दीवारों को
पुराने केलेंडर से सजाया जाता था
कहीं अल्लाह,कहीं जीजस
कहीं भगवान को लगाया जाता था
कहीं नेहरु के सर पर
कपिल देव नज़र आते थे
तो कहीं बगल में लगी
हेमा मालिनी को देख कर
बापू मुस्कुराते थे
इन नज़ारों को देखने
मोहल्ले का हर बच्चा आता था
रंग-बिरंगी इन नजारों में
दिवार का असली रंग खो जाता था
उन नजारों का रंग कहाँ खो गया
हम मकानों में चले आये और घर खो गया ….
न जाने ये कब और केसे हो गया ……..
कहाँ गया वो आँगन
वो अम्मा का कच्चा चूल्हा
आंगन में लगे नीम पर बंधा
वो रस्सी का झुला
कोने में बंधे बछड़े के साथ रम्भाती गय्या
चूल्हे पर सबके लिए रोटी बनती मय्या
मूंह हाथ धोने को कोने में रखे
हंडे गगरे बाल्टी और लुटिया
मोसम के मान से
धूप छांव तलाशती
दादाजी की खटिया
घांस फूस के छप्पर में रखे
ठंडे पानी के मटके काले-लाल
जिनकी दादी करती थी
बड़ी जतन से देखभाल
कहाँ गया वो मुड़ा-तुडा सन्दूक
वो दादाजी की पुरानी बंदूक
वो बरामदे में डला चिक का पीला पर्दा
वो पत्थर की चक्की
टूटे हत्थे की कुर्सी
और घी के कनस्तर पर टिका
वो सदियों पुराना पलंग
जिस पर लडकपन में सोने का
था अंदाज़ मलंग
कहाँ हे आंगन में लगा
वो लकड़ी का बुलंद दरवाज़ा
लोहे की मोटी सांकल
और भारी सी चोखट
जिस पर अक्सर होती थी
मेहमानों की खट -खट
वो टूटी हुयी खपरेल
वो दूर से गुजरती
छुक-छुक करती रेल
कहाँ गये गांव के वो मंज़र सुहाने
जब गर्मियों में बड़ों से छुप कर
जाते थे बच्चे नदी पर नहाने
उन दिनों जब बारिश का
रिमझिम मोसम आता था
घर के पीले आंगन में
कीचड़-कीचड़ हो जाता था
बारिश के उस मोसम में
हम खूब नहाते थे
और पानी से भरे गड्ढों में
कागज़ की नाव चलाते थे
सर्दियों में जब टूटी खपरेल की दरारों से
कच्ची सुनहरी धुप अंदर आती थी
रौशनी के उस डंडे को देख कर
बच्चों की तबियत मस्त हो जाती थी
धूप में तेरती धूल को पकड़ने की
सब कोशिश करते थे
और कभी हाथ न आने वाली
रौशनी के लिए बच्चे लड़ते थे
गहराती शाम में जब अम्मा
लालटेन जलाती थी
बच्चों को चुप करने के लिए
दादी खुद शोर मचाती थी
साँझ ढले जब बाबा खेत से आते थे
घर के सारे बच्चे उनके कांधे चढ़ जाते थे
न जाने वो दुलार कहाँ खो गया
हम मकानों में चले आये
और घर खो गया ….
न जाने ये कब और केसे हो गया ……
Author: परवेज़ इकबाल

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