रूही – न हास्य न भय



निर्देशक :- हार्दिक मेहता
अदाकार :- राजकुमार, वरुण शर्मा, जानवी कपूर, आमना शरीफ, पंकज त्रिपाठी

फ़िल्म से पहले एक चर्चा
फ़िल्म का नामकरण पहले स्त्री-2 दिया जा रहा था, फिर रूह अंत मे रूही दिया गया, निर्माता वही दल है जो स्त्री में थे, निर्देशक इसमे बदले गए है लेकिन ,,,,,
कॅरोना महामारी के बाद अब सिनेमाघरों का लगभग साल भर में खुलना एक सुखद अनुभव रहा,,
कहानी
बागड़पुर नाम का एक कस्बा है जहां दो नोजवान भौरा पांडे (राजकुमार) , कटर्नी (वरूण शर्मा) दोनो अच्छे दोस्त रहते है ,भोरा लोकल अपराध रिपोर्टर है, कटर्नी बस उसका दोस्त है, दोनो एक लोकल गुंडे के लिए काम कर देते है, अब ये दोनों लड़की अगवा करते है, अब एक समस्या इस गाँव की है जिसमे एक चुड़ैल है जो शादी से पहले लड़की के शरीर मे प्रवेश कर जाती है,
भौरा और कटर्नी रूही (जहान्वी कपूर) को अगवा करते है,
अब दोनों दोस्तो को रूही से प्रेम हो जाता है परंतु रूही के शरीर मे तो उसकी आत्मा के अलावा एक बुरी आत्मा और है जिसका असर समय समय पर नज़र आता है, और यह बुरा साया तब रूही को छोड़कर निकल जाएगा जब रूही शादी कर लेंगी,
अब एक प्रेम त्रिकोड में कौन त्रिज्या के समरूप बनेगा और कौन नही
यानी किसका विवाह होगा और किसका नही फ़िल्म देखी जा सकती है
अदाकारी
राजकुमार अपनी तरह के इकलौते अभिनेता है, जो फ़िल्म को कंधों पर खिंचते दिखे, जहान्वी को अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है, वरूण को लम्बा स्क्रीन टाइम मिला है लेकिन अभिनय में कुछ नयापन नही परोसते, पंकज त्रिपाठी कम में भी बेहतर निकाल देते है वह आधुनिक ओमप्रकाश के समतुल्य से हो गए है,
कमज़ोरी
फ़िल्म को स्त्री की तर्ज पर हास्य और भय का मिश्रण बताया गया था लेकिन यह फ़िल्म न तो हंसाने में कामयाब होती है न ही डराने में,
लोकेशन के नाम पर कूल जमा तीन जगहों पर फ़िल्म खत्म हो जाती है, गाँव, जंगल, गाँव,
फ़िल्म के शुरूआत में जो कपड़े एक्टर्स पहने होते है अंत तक वही देखना खलता है,
ढेढ गाव वाले होने के बावजूद संवाद में ट्रम्प की चर्चा भी खलती है,
गानों के नाम पर अंत मे एक गाना मिलता है,

फ़िल्म समीक्षक :- इदरीस खत्री

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