टांगा क्या किसी को उल्टा !

एक महीना तो हो गया । खबरों में तो कहीं सुनने देखने में नहीं आया कि सीएम ने किसी कलेक्टर, कमिश्नर को उल्टा टांगा हो। हां जिलों में कलेक्टरों, हर चार-पांच कलेक्टरों के सिर पर कमिश्नर बैठे होने के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही कहें या आमजन की परेशानी का आलम यह है कि किसी विभाग में हाथों हाथ समस्या के निराकरण करने जैसी तत्परता नजर नहीं आती।

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कीर्ति राणा

जिलों में कलेक्टर का अमला यदि किसान-व्यापारी का विश्वास जीतने में फेल साबित हुआ है तो कलेक्टर और कमिश्नर के बीच अज्ञात अहं के कारण मौका लगते ही एक दूसरे को निपटाने का खेल जारी है । पार्टी बैठकों में, सीएम से मुलाकात के दौरान जब पार्षद से लेकर विधायक, सांसद तक कहते थे कि एसडीओ, एसडीएम, कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ उनकी बात नहीं सुनते, बिना लिए दिए खसरे की नकल, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र तक नहीं बनते तब ऐसी सारी शिकायतों पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से लेकर सीएम तक डपटते रहे कि आप के हितों की पूर्ति नहीं होती इसलिए आप लोग प्रशासन को बेवजह बदनाम कर रहे हैं। मंदसौर से भड़की किसान आंदोलन की आग में सरकार की इतनी फजीहत नहीं होती यदि सरकार ने प्रशासन को इतना सिर ना चढ़ाया होता।

यह तो अच्छा हुआ कि अमित शाह मप्र के हालचाल जानने आ गए तो सरकार को भी अपनी सीआर उजली दिखाने की चिंता हो गई। इससे बड़ा मजाक क्या होगा कि मप्र में डेढ़ दशक से शिवआराधना हो रही हो और नींद से भड़भड़ा के उठा मुखिया दहाड़ लगाए कि कलेक्टर एक माह में नहीं सुधरे तो उल्टा टांग दूंगा। वैसे जनता ने इस जुमलेपर भी ताली तो नहीं बजाई क्योंकि वह तो इतने वर्षों में ऐसी लच्छेदार डायलॉग वाली फिल्म देखने की आदी हो चुकी है। किसान ही क्यों कर्मचारी तक को पता रहता है कि मंच से सरकार के मुखारविंद से अगली लाइन में क्या शब्दवर्षा होगी।

उल्चा टांगने की जब चेतावनी दी जा रही थी तब भाजपा का आम कार्यकर्ता आपस में एक दूसरे से यह जरूर पूछ रहा था कि बीते १३ साल में इन अधिकारियों को बिगाड़ने क्या केरल -कर्नाटक से अलीबाबा आया था! तेरह सालमें बिगड़ के धूल हो चुका प्रशासन एकमहीने के अल्टीमेटम में नहीं सुधरेगा यह सरकार को भी पता था लिहाजा उल्टा टांगने के ब्रह्म वाक्य को किसी ने गंभीरता से लिया भी नहीं।
तहसीलदार से लेकर, कलेक्टर, कमिश्नर तक सब जगह एक सा ढर्रा…! मानो महाकाल की नगरी का भांग प्रसाद सब जगह भर भर गिलास बंट रहा हो।

सिर्फ इंदौर की ही बात कर लें। प्रदेश की औद्योगिक राजधानी वाले इस शहर में इन तेरह सालों में विधायकों-पार्षदों को शायद ही किसी ऐसे कलेक्टर का नाम याद हो जिसने जनप्रतिनिधियों के मान सम्मान का खयाल रखा हो। कहां, किसे, कौन सा पद पसंद है इस तप-साधना में जो माहिर होते हैं वही तो मलाईदार इंदौर सहित अन्य बड़े शहरों में पोस्टिंग पाते हैं। इंदौर में पदस्थ किए जाने वाले बड़े अधिकारियों को शहर से ज्यादा खुद की छवि बनाने पर फोकस रहता है। किसी को अपने काम की डाक्यूमेंट्री बनाने से फुर्सत नहीं मिलती तो कोई अंगदान में महर्षि दाधीच से आगे निकलने के चक्कर में एमवायएच में मरीजों-बच्चों की मौत पर भी विचलित नहीं होता। अब तो यह हाल है कि जिले के मुखिया जनप्रतिनिधियों से सौजन्य मुलाकात भी जरूरी नहीं समझते। फिर किसे उल्टा टांगेगे?

इंदौर में काम नहीं हो रहा, सरकारी वसूली के टारगेट पूरे नहीं हो रहे फिर भी वर्षों से अधिकारी जमे हुए हैं तो ऐसे किन लोगों के टारगेट पूरे कर रहे हैं ? न विधायकों की चलती है ना जनसुनवाई में समस्या हाथोंहाथ दूर होती है। सीएस ने तीन एसडीएम, दो तहसीलदारों पर इतनी सख्त कार्रवाई की, होना भी चाहिए लेकिन उन कमिश्नर और पूर्व कलेक्टर का क्या हुआ, जिनकी नाक के नीचे लापरवाहियों के पौधे अमरबेल बनते रहे! सीएस ने भी छोटी मछली का शिकार करने में ही भलाई समझी! अब सीएस को जवाब देने के लिए तहसीलदारों के कंधे इस्तेमाल किए जा रहे हैं। सरकार तो जाने कब एक्शन में आएगी, तीन दिन कामकाज बंद करके स्टेट सर्विस लॉबी यह धमकी जरूर दे रही है कि सोच लो, अगले साल चुनाव है, काम हमसे ही पड़ेगा।

अगले साल सरकार की तीन तेरह वाली हालत न हो जाए शायद इसीलिए लाड़-प्यार वाली सरकार अब फटकार का अभिनय कर रही है। जिलों में समीक्षा, जनसुनवाई, किसानों-आदिवासियों के लिए लोक लुभावन यात्रा अब सब याद आना ही है क्योंकि अगले साल जनता की अदालत जो लगने वाली है। मप्र से कांग्रेस की बिदाई का श्रेय उमाभारती को जितना दिया जाता है उसमें कुछ योगदान तो दिग्विजय सिंह का भी था। ठीक वैसे ही आसार यदि बन रहे हैं तो इसमें शिवराज सिंह से अधिक वो अफसर मंडली है जो सरकार के आंख-कान बने हुए हैं, सरकार के कामकाज पर नजर रखने वाले संघ-संगठनों की चिंता बढ़ रही है तो इसीलिए कि मंत्री से लेकर विधायक तक सब नाराज हैं सरकार के रंग-ढंग से । जिनकी सत्ता है वो नाराज हैं, जिन्होंने प्रदेश की बागडोर लगातार सौंपी वो भी नाराज हैं , तो खुश कौन है? वह सब भी खुश नहीं होंगे जो रिश्वत के मामलों में रंगेहाथों पकड़े जा रहे हैं, फिर तो वही खुख होंगे जो मिल बांट के खाने और पचाने में माहिर हैं।

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