रविवार

काश.. आज फिर रविवार होता…
सो जाती फिर से… मुह ढांप के…
करवट भी न बदलती… फिर तो…
सोती रहती तान के…
खोयी रहती… मै तो…
निद्रा के आगोश में…
पावों को क्यूँ मैला करूंगी
देखूंगी ख्वाब मजेदार से…
बाहर तो है घुप्प अँधेरा…
भीतर है आनंद का बसेरा…
नफरत की कालिख से बच लूं…
अंतर के कैनवास को रंग लूं
अनिद्रा के स्वप्न भयंकर…
टूटे कहीं छनाक से…
बाहर है बस मरुधरा…
भीतर है… हरसिंगार रे…
नैनों के ना निकट आये…
कलुषित हृदय जमात के…
भीतर ही भीतर बनते हैं…
सीपी मोती नाज़ से…

Author: Jyotsna Saxena (ज्योत्सना सक्सेना)

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