“सावधान….कोरोना का टोना लापरवाहियों के आखेट पर है

जब से मुल्क-प्रधान ने कहा है कि आपदा को भी अवसर के रूप में देखिए, कुछ लोग अवसरों के पीछे गोया हाथ धोकर ही पड़ गए हैं | कोई अवसर को भुना रहा है तो कोई किसी के भुनाए हुए अवसरों पर मन ही मन भुनभुना रहा है | उसकी शिकायत है कि उसका अवसर मेरे अवसर से आखिर इतना उजला कैसे है ? खैर... उजला हो या काला अवसर तो बापड़ा अवसर है | वह बापड़ा होकर भी बड़ा ही चालबाज है | सो वह किसी को भी कायदे से अपने ऊपर मुकम्मल हाथ नहीं रखने दे रहा | हाथ में आ-आकर भी लगातार फिसले जा रहा है | फिसल इसलिए रहा है क्योंकि लगातार बीस सेकंड तक हाथ धोता आदमी अवसर को भी किसी साबुन की टिकिया की तरह वापरने की जुगत में भिड़ा पड़ा है | सो, अवसर सभी के हाथ तो आ रहा है मगर फिसले-फिसले जा रहा है | बावजूद इसके अवसर-परस्ती बाकायदा अपना सापेक्ष रोल निभा रही है | वह किसी आसन्न खतरे से हार मानने को कतई तैयार नहीं है |

इधर, कोरोना का आसन्न ख़तरा मन ही मन मुस्कुरा रहा है | वह अपनी घातक उपस्थिति को लेकर किसी शिकारी सा आश्वस्त बना हुआ है | सयाने लोग भले ही उसकी आड़ में यथा-संभव अवसर की तलाश में लगे हों | मगर वह भी घोर सयानों के बीच अपने लिए घात लगाए अवसर तलाशे जा रहा है | उसे अवसर भरपूर मिल भी रहे हैं | अवसर किसी के जर ख़रीद गुलाम जो नहीं होते | वे सबके लिए समान सुलभ हैं । जहाँ, अवसरों को आपदा की नंगी आड़ दरकार है…वहीं आपदा को अवसरों का हरा-भरा झुरमुट आकर्षित कर रहा है | कुलमिलाकर दो निहत्थे मौका-परस्त अवसर-पसंदा मिलकर एक दूसरे का शिखंडी शिकार कर रहे हैं | जबकि वास्तव में कौन किसका शिकार बन रहा है यह खुद वास्तविक शिकारी को ही पता है | एक तरफ शिकारों को धंधे की तलाश है….तो दूसरी तरफ शिकारी कोरोना को बेपरवाह बंदों की मूर्ख हरकतों की | बंदे खुद होकर शिकारी के फंदे में अपने वर्जिन गले परोस रहे हैं | ये खुशनाक नज़ारे देखकर कोरोना बेहद ख़ुश है कि उसका रकबा दिन दूना और रात चौगुना होकर बढ़ता ही जा रहा है | रोजाना उसके निवेश की दावतें जो हो रही है….और रोजे की शेरी में मुफ्त के शिकार फंस रहे हैं |

उधर, सरकारी व्यवस्था शिकारों के ये बेपरवाह हालात देखकर हैरान है | वह लोगों को सावधानी के लिए तरह-तरह की एडवाइजरियाँ जारी कर रही है | ऐसा कर वह अपना खुद का हौंसला भी बढ़ा रही है | बीच-बीच में वह माकूल व्यवस्थाओं के नाम पर अपनी स्वयं की पीठ खुद भी ठोक लेती हैं | मगर इस कवायद से कुछ ज्यादा हासिल नहीं हो पा रहा | आमजनता की लापरवाहियां व्यवस्था के जज्बों की हवा निकाले दे रही है |

शहरी बाज़ारों से निकलो तो नज़ारे देखकर लगता है कि बेपरवाह लोगों ने मास्क की गोया अस्मत ही लूट रखी है | व्यवस्था चिल्ला-चिल्लाकर लोगों को समझा रही है कि मास्क लगाओ…मास्क लगाओ | और वह सोशल डिसटेंसिंग का पालन करने के करुणाजनक नारे भी बुलन्द कर रही है | उल्लंघन करने पर जुर्माने की नकद पावतियाँ तक काट रही है | मगर शिकारोन्मुक्त लोगों के आत्महंता कानों पर जैसे जूँ तक नहीं रेंग रही | कोई कानों में कुंडल के समान मास्क लटकाए अपनी मूर्खता का भजन गुनगुना रहा है | तो कोई ठोड़ी पर मास्क का झूला लटकाए आ बैल मुझे मार की पींगे भर रहा है | जबकि किसी-किसी के मास्क तो नाक के नीचे चंद्राकार ऐसे लटके हुए हैं जैसे वे उनकी साँसों के निर्भय आवागमन को फ्री-स्पेस दे रहे हों | जनता भयमुक्त है और मास्क की इज्जत तार-तार | और कोरोना के खौफ की तो जैसे वाट ही लगी पड़ी हो | पता नहीं पब्लिक के इन दुस्साहसिक स्टंटों का कोरोना बुरा भी मान रहा है, या नहीं | और बुरा मान भी जाए तो आखिर इन बेख़ौफ़ मूर्खताओं का वह क्या कुछ बिगाड़ लेगा |

सयानी सरकार लोगों को करीने से समझा रही है कि हमें कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालनी होगी | मगर लोग सरकार के मशवरे से भी दो-कदम आगे जाकर कोरोना के भय का बगैर लीव-इन ही रेप करने पर आमादा हैं | ऐसा नहीं है कि सभी लोग कोरोना से लापरवाही में दिल्लगी किए बैठे हैं | कुछ लोग कोरोना के खतरे से अतिशय सावधान भी हैं | मगर उनकी इस अतिरिक्त सावधानी को भी गोया पलीता ही लग रहा है | उन लोगों के कारण जो कोरोना के खतरे को हलके में लेकर उसके खौफ का खुला मान-मर्दन करने पर तुले हुए हैं |

उधर, चीन की तरह ही घुन्ना कोरोना बेहतर जानता है कि उसके हमाम में सभी लोगों की साँसें एक दूजे से गहरे वाबस्त हैं | उसे यह भी पता है कि लोगों का एक फेफड़ा भीतर है तो दूसरा शरीर के बाहर भी है | उसे यह भी अच्छे से पता चल गया है कि जो लोग अतिशय सावधान हैं, वे भी अंततः उन लोगों की कीमत पर खर्च हो सकते हैं, जो कि अपनी मूर्खता के मारे घोर असावधान बने हुए हैं |

लेखक :- राजेश सेन

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