अंतरात्मा से जागिये, लाभ का लोभ तो छोड़िए

यह आलेख पंद्रह दिन पहले लिखा था… जिसमें गुजारिश की गई थी इस आपदाकाल मे हर कोई लाभ का लोभ छोड़े और इस विषम परिस्थिति से निबटने में सहायक हो..इसके तत्काल बाद इंडियन मेडिकल एसो ने डॉक्टरों की निशुल्क सलाहकार टीम तैयार कर दी, इंदौर कलेक्टर ने भी इसमें योग दिया, आज उन्होंने एक बड़ा राहत का कार्य किया, सौ से अधिक निजी अस्पतालों में बेड और इलाज के दर निर्धारित कर दिए,अब तक अस्पतालों में अनाप शनाप बिल बन रहे थे, यह काम अस्पतालों को संगठित तौर पर करना था ,लेकिन नहीं किया तब जिला प्रशासन को इस मानवीय पहलू पर निर्णय लेना पड़ा.. आलेख का पुरावलोकन किजिये
:- सुरेन्द्र बंसल :-

कोविड को लेकर क्या स्थिति है इस पर लगातार लिखना अपने ,अपनों और सबको डराना है। जो कुछ है वह सबको पता है, जो चल रहा वह भी। लेकिन मुझे जो चीज डरा रही है वह लोगो का लोभ है।इस विकट समयकाल में कुछ लोग अब भी अपना लोभ नहीं छोड़ रहे हैं, ऐसे लोग जो स्वयं के योग से बहुत कुछ कर सकते हैं लोभ से अछूते नहीं हैं। ऐसे लोग लुटेरे तो नहीं लेकिन लोभी जरूर लगते हैं।

हम कोरोना वारियर्स के रूप डॉक्टर, नर्स, हॉस्पिटल, पुलिस, प्रशासन आदि को सेवा भाव से कार्य करते हुए देख रहे हैं फिर भी बहुतेरे ऐसे लोग हैं जिन्होंने आपदा को कमाई का अवसर बना लिया है, उनकी मानवता पसीज नहीं रही है।आज एक साल के भीतर मंहगाई 50 फीसदी तक बढ़ गई है और आम जन की आमदनी इसी दर से घट गई है। मध्यम वर्ग का आमदनी का माध्यम टूट गया है उसी तरह जैसे आशाएँ और स्वप्न टूट बिखर जाते हैं ,अपनी जरूरतों की नितांत पूर्ति से अशक्त मध्यम वर्ग पर कोरोना काल का द्वितीय चक्र सबसे ज्यादा घात कर रहा है। अपने सुहाग और प्रियजन को बचाने के लिए महिलाएं हाथों के कंगन, मंगल सूत्र और माथे की स्वर्णबिंदी बेचने गिरवी रखने के बाद सपनो का घर तक बेचने को मजबूर है ,बहुत से परिवार टूट गए हैं,छोटे हो गए हैं या मिट गए हैं । किसी को कोई सुध नहीं है, बेपरवाही की सरकारें न जाने किस मद में है शायद उनके भी हाथ पैर फुले हुए हैं या यह समंझ सर चढ़ गयी है कि कुछ नहीं किया जा सकता। सही भी है सब दोष सरकार को देने से क्या होगा,आखिर आपदाएं तात्कालिक उपज होती है और व्यवस्थाएं नीति ,रीति, प्रीति से संयोजित होकर संसाधनों से सफल तथा कारगर होती है। ऐसे में आपदाएं और कठिन हालात कर देती हैं जब अवसरों की तरह उसमें लोग लिप्त हो जाते हैं।

सब देख रहे हैं आपदाओं के साथ कुछ लोगों के लिए अवसर भी बहुत बढ़े हैं और कुछ मानवीय पहलू को नज़रंदाज़ कर अपने उदर को चौड़ा कर सब कुछ निगलते जा रहे हैं, जबकि उदारता इस समय पहली फसल होना चाहिए थी जो हर जगह लहलहाती दिखती। मेरा किसी से यह कहना कतई नहीं है कि वह सोनू सूद बने दिखे और करें, ऐसा इसलिए सोनू सूद होने के लिए कलेजा चाहिए या इंदौरी विधायक संजय शुक्ला की तरह जुनूनी होने का जज़्बा। संजय शुक्ला किसी भी रीत से कर रहे हों लेकिन लाभ जरूरतों को दे रहे है। ये अवसर और भी नेताओं और राजनीतिकबाजों को भी समान था लेकिन हर कोई न सोनू सूद होता है और न ही संजय शुक्ला होता है।

जरूरी यह नहीं है कि इस विकट समय में अपना धन निकाल कर पुण्य की तरफ चलें जरूरी यह हैं कि आप अपना लाभ का लोभ छोड़े और लागत पर सेवा का संकल्प करें। यह करना आसान है, कुछ नहीं बस कोरोना मरीजों से ,परिवारों से कोई लाभ नहीं कमाने का संकल्प करना है, यही उदारमना सेवा का अतुलनीय उदाहरण बन सकता है, इसमें कोई नुकसान नहीं है बस किसी तरह का लाभ नहीं है।

डॉक्टर ,मेडिकल व्यवसायी, हॉस्पिटल, होटल रेस्टॉरेंट, ऑक्सीजन सप्पलायर्स,वस्त्र व्यवसायी आदि इसी तरह के आवश्यक पूर्ति में बिना लाभ हानि के कार्य करने का संकल्प कर सकते हैं उन्हें लाभ का लोभ छोड़ना पड़ेगा।लेकिन समय इनमें से बहुतों के लिए धन अर्जन उपार्जन का माध्यम बन गया है लोगों की बचत और जीवन का विसर्जन हो रहा हैं लेकिन इनमें ऐसे लोगो को लोभ से लाभार्जन का छुटकारा नहीं मिल रहा है, मानवता ,सेवा के समय लोभ से जो पाप उपार्जित हो रहा है उससे डरने और दूर होने की जरूरत है। अस्पतालों ने खुलकर बड़े बिल तैयार किये, दवाओं की कालाबाज़ारी हुई, डॉक्टरों ने घर बैठे सलाह देने की फीस ही हज़ारों में कर दी, किस तरह का दानवी व्यापार है यह और किसलिए किया जा रहा है, इतना धन कहाँ लेकर जा सकते हैं कभी सोचा है नहीं तो अभी सोचिए। हालात बहुत बदल गए हैं पहले ढाई मीटर कपड़े में सहेजकर, सजाकर आखरी बिदाई होती थी अब पता नहीं कब किसे कहाँ पीपीई पॉलीथिन में लपेटकर कचरे की तरह फेंक-फूँक दिया जाए,यह बात अब सबको अपने दिमाग मे रख लेना चाहिए इसलिए भी कि अब राख भी समेटी नहीं जाती।

क्या करें..सोचिए क्या कर सकते हैं.. आप डॉक्टर है तो सिर्फ कोविड मरीज़ों को मुफ्त में सलाह दीजिये,कहीं मत जाइए अपने आसपास के मरीजों को ही संभाल लीजिये,उन्हें ऑनलाइन, ऑनफोन सलाह प्रिस्क्रिप्शन दीजिये।
मेडिकल व्यवसायी है चाहे निर्माता, वितरक या खुदरा बिना लाभ के लागत मूल्य पर कोरोना की जीवनरक्षक दवा दीजिये।
मेडिकल के उपकरण निर्माता , विक्रेता, ऑक्सीजन प्रदायकर्ता भी लागतं मूल्य पर यह सेवा कर सकते हैं।एम्बुलेंस चालक, लोकवाहन चालक, ट्रेवल्स, आदि भी सिर्फ अपनी लागत मूल्य वसूले तो यह सेवा का कार्य होगा।
कोविड मरीजों के लिए भोजन की व्यवस्था भी अब कठिन काम हो गया है जब कोरोना संक्रमण पूरे परिवार को हो रहा है। ऐसे में होटल , रेस्टॉरेंट, भोजनालय, मरीजों को लागत मूल्य पर भोजन दे सकते हैं इसमे प्रदाय के लिये जोमैटो और स्वीगी जैसे संस्थाएं भी आगे आकर मदद करे।

सरकार और प्रशासन क्या करे..कुछ नहीं उन्हें भी बिना लागत मूल्य से ऐसे अवसर निर्मित करना है जिससे लोग स्वप्रेरित होकर कोरोना से निबटने में सहायक हो। नगर निगम को चाहिये साफ सफाई के साथ सेनेटायजिग पर विशेष काम करे जरूरी हो तो लागत मूल्य ही वसूल करे। मेडिकल बीमा सरल सुलभ कैसे हो यह व्यवस्था तत्काल की जाना चाहिए। कोविड मरीजों को किस तरह टेक्स भार से छूट दी जाए इस पर भी अमल किया जाना चाहिए।

आपदा कोई अवसर नहीं बने सेवा का कारक बने तो इससे बेहतर जिंदगी का कोई पुण्य नहीं हो सकता ,अब तक जो हुआ उसे भूला जा सकता है यदि इस आपदा में सहयोग की नई रीत शुरू हो जाये और लोग अपनी अन्तरात्मा से जागकर सिर्फ लाभ का लोभ छोड़ने के लिए संकल्पित हो जाए।हो सकता है, शुरू कीजिए।

लेखक :- सुरेन्द्र बंसल (वरिष्ठ पत्रकार)

अंतरात्मा से जागिये, लाभ का लोभ तो छोड़िए
सब देख रहे हैं आपदाओं के साथ कुछ लोगों के लिए अवसर भी बहुत बढ़े हैं और कुछ मानवीय पहलू को नज़रंदाज़ कर अपने उदर को चौड़ा कर सब कुछ निगलते जा रहे हैं, जबकि उदारता इस समय पहली फसल होना चाहिए थी जो हर जगह लहलहाती दिखती।

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