फिर याद आ गए तुम

तारों के झिलमिलाते आँगन में
अम्बर के अंतहीन ह्रदय में अंकित
पूर्णिमा का चाँद देखते ही
एक बार फिर
याद आ गए तुम —-
युगल पंछियों का
नीड़ की ओर बढ़ना
देख धरा की प्यास
श्यामल पावसों का उमड़ना
मुखरित हुआ अनूठा एहसास
प्रतीक्षारत साँझ में
एक बार फिर
याद आ गए तुम —-
चाँद की लरजती खूबसूरती में
मुग्ध तारों का मौन हो जाना
आकाश की स्तब्ध नीरवता में
एक बार फिर
याद आ गए तुम —-

Author: Jyotsna Saxena (ज्योत्सना सक्सेना)

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